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26-09-2022
बुंदेली लोकगीत आल्‍हा गायन कार्यक्रम का आयोजन

राजभाषा पखवाड़ा के उपलक्ष्‍य में बुंदेली लोकगीत आल्‍हा गायन कार्यक्रम का आयोजन

उत्‍तर मध्‍य रेलवे मुख्‍यालय में 14 सितंबर से 29 सितंबर, 2022 तक आयोजित राजभाषा पखवाड़ा के उपलक्ष्‍य में रेलगाँव, सूबेदारंगज स्थित अधिकारी क्‍लब में महाप्रबंधक श्री प्रमोद कुमार की अध्‍यक्षता एवं मुख्‍य अतिथि, उत्‍तर मध्‍य रेलवे महिला कल्‍याण संगठन की अध्‍यक्षा, श्रीमती पूनम कुमार की गरिमामयी उपस्थिति में बुंदेली लोकगीत आल्‍हा गायन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में नवरस बुंदेली लोक कला समिति, महोबा के कलाकारों द्वारा आल्‍ह खंड की सजीव एवं जीवंत प्रस्‍तुति की गई। इस अवसर पर महाप्रबंधक श्री प्रमोद कुमार ने अपने अध्‍यक्षीय संबोधन में कहा कि राजभाषा पखवाड़ा में आयोजित किए जाने वाले विविध कार्यक्रमों के बीच अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से जुड़ा यह आयोजन निश्चित तौर पर एक अनूठी पहल है। अपने सहज प्रवाह और बहु आयामी स्वरूप में हिंदी भाषा और हिंदी के साहित्य ने देश के विभिन्न प्रांतों और अंचलों की लोक विधाओं, लोक परंपराओं और संस्कृतियों को बखूबी सहेजा और संजोया है। इसीलिए इसका भाषाई और साहित्यिक स्वरूप इतना समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इन्हीं खूबियों के कारण हिंदी कई शताब्दियों से देश की संपर्क और जनभाषा रही है और आजादी के बाद इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया।

महाप्रबंधक श्री प्रमोद कुमार ने कहा कि देश की संस्कृति में लोक नृत्य, लोक गीत और लोक संगीत का प्रमुख स्थान होता है। इसकी झलक विभिन्न त्योहारों,उत्सवों पर देखी जाती है। हमारे विशाल देश की लोक गीत परंपरा पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं और जनविश्वास से गुंथी हुई है, जिसके कारण आम जनमानस में ये लोक गीत बहुत ही लोकप्रिय हैं और इन्हें व्यापक मान्यता मिली हुई है। इन लोक गीतों मे शौर्य, पराक्रम एवं वीरता की भावनाओं से पूर्ण लोक काव्य हमेशा से ही हमारे अंदर अपने देश और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना का संचार करते रहे हैं।

आल्हा भले ही आल्हा और उदल जैसे शूरवीरों की वीरगाथा वाले रासो साहित्य की रचना परंपरा से निकला हो,लेकिन ओज और कड़कती हुई आवाज, युद्ध के मैदान के सजीव चित्र,बंदूक की गोलियों, तलवारों की टंकारों एवं टकराहट आदि के जीवंत चित्रण जैसी विशेषता के कारण आल्हा की यह विधा इतनी लोकप्रिय हो गई कि यह बुंदेलखंड से बाहर निकलकर विभिन्न अंचलों और भाषाओं की भी थाती बन गई। यह आल्‍हा की ही खूबी है कि इसकी गायन शैली को आल्‍हा छंद का नाम मिला और कालांतर में समकालीन जीवन के विविध पक्ष इसकी कथा के अंग बन गए तथा हिंदी फिल्मों के गीतों में भी आल्‍हा शैली को बखूबी अपनाया गया। आज के उपभोक्‍तावादी दौर में आल्‍हा जैसी लोक परंपराओं का संरक्षण बहुत ही आवश्‍यक है।

इस अवसर पर मुख्‍य राजभाषा अधिकारी एवं प्रधान मुख्‍य वाणिज्‍य प्रबंधक श्री शशिकांत सिंह ने समारोह के अध्‍यक्ष श्री प्रमोद कुमार का स्‍वागत एवं अभिनंदन किया। उप मुख्‍य राजभाषा अधिकारी श्री शैलेन्‍द्र कुमार सिंह द्वारा धन्‍यवाद ज्ञापित किया गया। वरिष्‍ठ राजभाषा अधिकारी श्री चन्‍द्र भूषण पाण्‍डेय ने समारोह का संचालन किया। कार्यक्रम में अपर महाप्रबंधक सहित सभी प्रधान मुख्‍य विभागाध्‍यक्ष, मुख्‍य विभागाध्‍यक्ष तथा बड़ी संख्‍या में अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित थे। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की।                                        

                                                                                                                




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